CRLR/344/2025, Vikesh Singh Negi Versus State of Uttarakhand मामले में माननीय उत्तराखंड उच्च न्यायालय के समक्ष 08 सितंबर 2026 को बहस पूरी होने के बाद निर्णय सुरक्षित किया गया था। इसके बावजूद, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, 11 सितंबर को कैबिनेट मंत्री श्री गणेश जोशी ने मीडिया के समक्ष यह दावा किया कि उनके विरुद्ध याचिका खारिज हो गई है।


इसके बाद 15 सितंबर 2026 के माननीय उच्च न्यायालय के आदेश में दर्ज किया गया कि कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण जिस पीठ ने बहस सुनी थी, उसके द्वारा मामले का निर्णय किया जाना उचित नहीं होगा और मामला दूसरी पीठ के समक्ष रखे जाने के लिए माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
जब न्यायालय का निर्णय सार्वजनिक रूप से सुनाया ही नहीं गया था, तब निर्णय का परिणाम पहले से सार्वजनिक रूप से घोषित करने का आधार क्या था?
यह प्रश्न किसी व्यक्ति के विरुद्ध राजनीतिक द्वेष का नहीं, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा का प्रश्न है।
हम यह भी स्पष्ट करते हैं कि न्यायालय के आदेश को हम राजनीतिक आरोप के रूप में नहीं, बल्कि संविधान एवं लोकतंत्र की रक्षा के रूप में देखते हैं। अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सक्षम न्यायालय द्वारा ही दिया जाएगा। लेकिन किसी मंत्री द्वारा न्यायालय के निर्णय से पूर्व उसके परिणाम की घोषणा किए जाने की परिस्थितियों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
गणेश जोशी द्वारा 11 सितंबर को दिए गए कथित बयान और उसके आधार की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए।
यह पता लगाया जाए कि निर्णय सुनाए जाने से पूर्व उन्हें कथित निर्णय की जानकारी कैसे प्राप्त हुई।
यदि जांच में न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने, गोपनीय न्यायिक जानकारी प्राप्त करने अथवा किसी अन्य गंभीर अनियमितता के तथ्य सामने आते हैं तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाए।
देश के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी एवं उत्तराखंड के मुख्यमंत्री माननीय श्री पुष्कर सिंह धामी से मांग है कि संवैधानिक मर्यादाओं एवं मंत्री पद की शपथ के अनुरूप श्री गणेश जोशी को तत्काल मंत्री पद से हटाया जाए, अथवा कम से कम जांच पूरी होने तक उनके मंत्री पद पर बने रहने की उपयुक्तता पर निर्णय लिया जाए।
श्री गणेश जोशी की विधायक पद की सदस्यता समाप्त करने के संबंध में भी सक्षम संवैधानिक प्राधिकारी द्वारा कानून के अनुरूप आवश्यक कार्रवाई की जाए। पूरे घटनाक्रम की जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय एवं संबंधित संवैधानिक प्राधिकारियों को भेजकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
इस अवसर पर श्रीमती सुजाता पॉल
प्रदेश उपाध्यक्ष, उत्तराखंड कांग्रेस ने कहा कि
यह केवल गणेश जोशी का व्यक्तिगत मामला नहीं है। यह सवाल है कि क्या सत्ता में बैठे किसी व्यक्ति को न्यायालय के निर्णय से पहले ही उसके परिणाम की घोषणा करने का अधिकार है? आज उत्तराखंड की जनता यह जानना चाहती है कि आखिर 11 सितंबर को मंत्री जी को उस निर्णय की जानकारी कैसे थी, जो उस समय सार्वजनिक रूप से सुनाया ही नहीं गया था। हम मुख्यमंत्री से मांग करते हैं कि संवैधानिक मर्यादा को देखते हुए गणेश जोशी को तत्काल मंत्री पद से हटाया जाए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए।” सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर श्री सर्वेश डंगवाल ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत हमारी संवैधानिक संस्थाएं हैं। सेना में सेवा करते हुए हमने संविधान की सर्वोच्चता और संस्थागत अनुशासन को सर्वोपरि माना है। आज यदि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा न्यायालय के निर्णय से पूर्व ही उसके परिणाम की घोषणा किए जाने का आरोप सामने आता है, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है। सरकार को इस मामले में चुप्पी साधने के बजाय स्पष्ट जवाब देना चाहिए। संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता किसी भी राजनीतिक व्यक्ति से बड़ी है।”अधिवक्ता एवं प्रवक्ता, उत्तराखंड कांग्रेस पंकज सिंह क्षेत्री ने कहा कि “मैं अधिवक्ता होने के नाते यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि 8 सितंबर को बहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित था। 11 सितंबर को मंत्री जी द्वारा अपने पक्ष में फैसला आने का दावा किया गया और 15 सितंबर के आदेश में माननीय न्यायालय ने मामले को दूसरी पीठ के समक्ष रखने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया। हमारा सवाल सीधा है—फैसला आने से पहले फैसला किसे पता था और कैसे पता था?”
यह किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करने का विषय नहीं है। हम केवल यह मांग कर रहे हैं कि इस असाधारण घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच हो। यदि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का आचरण संवैधानिक मर्यादा के विपरीत पाया जाता है, तो उन्हें मंत्री पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं होना चाहिए। इसलिए हमारी मांग है कि श्री गणेश जोशी को तत्काल मंत्री पद से हटाया जाए और उनकी विधायक सदस्यता के संबंध में भी सक्षम संवैधानिक प्राधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई करे।”“न्यायालय का फैसला न्यायालय ही सुनाएगा, कोई मंत्री नहीं। संविधान सर्वोच्च है, सत्ता नहीं।”
प्रेस वार्ता में
सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर श्री सर्वेश डंगवाल
सुजाता पॉल — प्रदेश उपाध्यक्ष, उत्तराखंड कांग्रेस
पंकज सिंह क्षेत्री( अधिवक्ता) प्रवक्ता, उत्तराखंड कांग्रेस मौजूद रहे।

भूपेंद्र कुमार

By भूपेंद्र कुमार

प्रधान संपादक

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