ज्योति एस, दयालबाग, आगरा ।

परम पूज्य गुरु महाराज सत्संगी साहब एवं आदरणीया रानी साहिबा की पावन उपस्थिति में सत्संग की पवित्र कर्मभूमि खेतों पर कृषि कार्य के दौरान रविवार को “नर्सरी एंड प्ले सेंटर, स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस एवं स्कूल ऑफ आर्ट एंड कल्चर का संयुक्त वार्षिकोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

नर्सरी एंड प्ले सेंटर की स्थापना वर्ष 1941 में बच्चों के लिए एक प्ले सेंटर के रूप में हुई थी, जो आज इसी नाम से जाना जाता है। यहाँ 3 वर्ष से 5 वर्ष तक के बच्चे पढ़ाई, खेलकूद, शारीरिक व्यायाम आदि सीखते हैं, जिससे उनका सर्वांगीण विकास होता है।
स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस की स्थापना 12 मई 1965 को तेलुगू स्कूल के रूप में हुई थी। दिसंबर 1976 में विद्यालय के कार्यक्षेत्र का विस्तार किया गया और अन्य भाषाओं का भी शिक्षण प्रारम्भ हुआ। आज यहाँ आठ भाषाएँ—तमिल, तेलुगू, पंजाबी, बंगाली, उड़िया, संस्कृत, फ्रेंच तथा जर्मन—सिखाई जाती हैं। दो वर्ष के पाठ्यक्रम के बाद प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाता है। यहाँ छठी कक्षा से दसवीं कक्षा तक के बच्चों को प्रवेश दिया जाता है।
17 सितंबर 1979 को स्कूल ऑफ आर्ट एंड कल्चर की स्थापना हुई, जिसका प्रमुख उद्देश्य बच्चों में भारतीय संस्कृति और विभिन्न कलाओं से उनका परिचय कराना तथा उनकी प्रतिभा को निखारना रहा है। यहाँ दूसरी कक्षा से पाँचवीं कक्षा तक के बच्चे संगीत, नृत्य, ड्रामा, आर्ट और क्राफ्ट जैसी ललित कलाओं को बड़े उत्साह से सीखते हैं और विभिन्न कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन भी करते हैं। चार वर्ष के पाठ्यक्रम के बाद प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाता है।
कार्यक्रम में आज नर्सरी एंड प्ले सेंटर के नन्हे-मुन्ने बच्चों ने इंग्लिश सॉन्ग “ओ ग्रेशियस लॉर्ड यू आर सो काइंड” प्रस्तुत किया।
स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस के बच्चों ने उड़िया भाषा में अत्यंत मनोहारी ऐक्शन सॉन्ग ‘आसो रे आसो कोरिबा चाषो’ की प्रस्तुति दी।
स्कूल ऑफ आर्ट एंड कल्चर के विद्यार्थियों ने भाव नृत्य ‘सारी सृष्टि जिससे जागी, बीज वही दिव्य वाणी’ प्रस्तुत किया।
अंत में ‘तमन्ना’ से कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर शिक्षकों ने दयालबाग की अद्वितीय शिक्षा प्रणाली और बच्चों के सर्वांगीण विकास पर प्रकाश डाला।
श्रीमती प्रीतम प्यारी (कार्यवाहक प्रभारी, स्कूल ऑफ आर्ट एंड कल्चर) ने बताया कि 15 मिनट की इस प्रस्तुति के लिए एक महीने से तैयारी चल रही थी, जो पूर्णतः “परमपिता” के पावन चरण-कमलों में समर्पित है।
श्रीमती स्वरूप रानी (डी.ई.आई. स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस) ने कहा कि बच्चों को अपनी भाषा के साथ-साथ फ्रेंच और जर्मन सहित आठ भाषाओं का ज्ञान दिया जा रहा है, ताकि वे भारतीय संस्कृति को वैश्विक स्तर पर पहुँचा सकें।
श्रीमती महाराज कुमारी (संगीत शिक्षिका, स्कूल ऑफ आर्ट एंड कल्चर) ने बताया कि संगीत और कला के माध्यम से भारतीय सभ्यता और संस्कारों को जीवित रखने के प्रयास किए जा रहे हैं।
श्रीमती मधु बनी (नृत्य शिक्षिका, स्कूल ऑफ आर्ट एंड कल्चर) ने बताया कि बच्चे प्रतिदिन भरतनाट्यम, कथक और लोक नृत्यों का अभ्यास करते हैं, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास होता है।
श्रीमती स्वामी प्यारी (प्रभारी, डी.ई.आई. नर्सरी एंड प्ले सेंटर) ने अपने 48 वर्षों के अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे 3 से 5 वर्ष के नन्हे बच्चे “खेतों” के प्राकृतिक वातावरण में उत्साहपूर्वक अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
पूरे कार्यक्रम का सजीव प्रसारण ई-सतसंग केसकेड के माध्यम से देश-विदेश के 580 से अधिक केंद्रों/शाखाओं पर किया गया।

भूपेंद्र कुमार

By भूपेंद्र कुमार

प्रधान संपादक

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