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हिमालय में जलवायु परिवर्तन और आपदा के विषय पर18 अक्टूबर को प्रारंभ हुई अध्ययन यात्रा यमुना के जल ग्रहण क्षेत्र से हुई है। इस अध्ययन यात्रा में शामिल सदस्य एनवायरनमेंट और सोशल रिसर्च आर्गेनाईजेशन के संजय राणा और सुरेश भाई और सर्वोदय कार्यकर्ता विशाल जैन हैं।जिनका 19 अक्टूबर को यमुनोत्री पहुंचने पर पुरोहितों द्वारा भव्य स्वागत किया गया है। पुरोहित खिलानंद भारद्वाज ने माल्यार्पण करके स्वागत किया।उन्होंने अध्ययन दल के सदस्यों के समक्ष यमुनोत्री क्षेत्र में पिछले लंबे समय से आ रहे मौसमी और पर्यावरणीय बदलाव पर चिंता व्यक्त की है, उन्होंने कहा कि निश्चित ही अनियमित वर्षा और लगातार चारों ओर के भूस्खलन और बंदरपूछ ग्लेशियर के सिकुड़ने के संकेत बता रहे हैं कि आगे भविष्य में चिंता जनक स्थिति यमुना के उद्गम में भी हैं। लेकिन उनकी आस्था है कि पवित्र यमुना की जलधारा जिस तरह से अविरल बह रही है।उनका विश्वास है कि अवश्य ही यहां की प्रकृति और पर्यावरण सुरक्षित रखने के लिए हम सब के प्रयास को सहयोग मिलेगा।
हजारों तीर्थ यात्री और पर्यटक हर रोज आ रहे हैं। चारों ओर प्लास्टिक की बोतले और पॉलिथीन यमुना के उद्गम में ही ढेर लगे हुए हैं। अध्ययन दल के सदस्यों ने यहां पर दर्जनों लोगों के इंटरव्यू लेकर पता किया कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं जो बर्फ पड़ती थी वह गायब हो गई है। यहां गर्मी बढ़ रही है। बरसात में भूस्खलन बड़ी तेजी से हो रहा है। स्थानीय स्तर पर अनेकों लोगों ने बताया कि बड़े निर्माण कार्यों से भी भूस्खलन और बाढ़ की समस्या बढ़ रही है। लेकिन इनमें से कुछ लोगों ने यह भी कहा की चार धाम में आने वाले तीर्थ यात्रियों के हिसाब से सड़क चौड़ीकरण की आवश्यकता है। जिसमें वे मानते हैं कि निर्माण कार्य से निकलने वाला मलवा यमुना नदी में नहीं फेंकना चाहिए। अतः जो भी यहां निर्माण हो वह बहुत मजबूत और टिकाऊ हो। जिससे यमुना के अस्तित्व पर संकट न हो।
बड़कोट से पलीगाड तक ऑल वेदर रोड का काम लगभग पूरा किया गया है। इस दौरान में देखने को मिला है कि इसके आसपास और आगे तक सड़क चौड़ीकरण के जो भी प्रयास किये है उसका अधिकांश मलवा यमुना की छाती पर उडेल दिया गया है। यहां पर औजरी, डाबर कोट, कुथनौर, किसाला के आसपास और सिलाई बैंड जैसे अनेक स्थान डेंजर जोन के रूप में दिखाई दे रहे हैं। यमुनोत्री के पैदल मार्ग पर देखा गया कि जगह-जगह यमुना नदी में 2024 की बाढ़ से मलवे के ढेर लगे हुए हैं। यमुनोत्री मंदिर के पास भी चारों ओर से लगातार छोटे-बड़े भूस्खलन के संकेत दिखाई दे रहे हैं।यहां पर भंडेली गाड़ से एक भूस्खलन हो रहा है। जो भविष्य में यमुना की धार को बाधित कर सकता है। इसको ध्यान में रखते हुए सड़क चौड़ीकरण के लिए शेष बचे लगभग 24 किलोमीटर की दूरी के निर्माण कार्य में यहां की प्रकृति और संस्कृति को बचाए रखने के लिए संयमित तरीके से हिमालय के साथ व्यवहार करने की आवश्यकता है, नहीं तो यह भविष्य में रौद्र रूप ग्रहण कर सकता है जो मैदानी क्षेत्र को भी प्रभावित करेगा।

भूपेंद्र कुमार

By भूपेंद्र कुमार

प्रधान संपादक

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